Thursday, 14 July 2016

Julर्

                              

                              रेडियोनामा ब्लांग से


ये आकाशवाणी है ! अब आप देवकीनंदन पाण्डे से समाचार सुनिये



किसी ज़माने में रेडियो सेट से गूँजता ये स्वर घर-घर का जाना-पहचाना होता था। ये थे देवकीनंदन पाण्डे अपने ज़माने के जाने-माने समाचार वाचक। अपने जीवन काल में ही पाण्डेजी समाचार वाचन की एक संस्था बन गए थे। उनके समाचार पढ़ने का अंदाज़, उच्चारण की शुद्धता, स्वर की गंभीरता और गुरुता और प्रसंग अनुरूप उतार-चढ़ाव श्रोता को एक रोमांच की स्थिति में ले आता था। कानपुर में पैदा हुए देवकीनंदनजी के पिता शिवदत्त पाण्डे अपने क्षेत्र के जाने-माने डॉक्टर थे। बेहद रहम दिल और आधी रात को उठकर किसी भी मरीज़ के लिए मुफ़्त में इलाज करने को तत्पर। मूलरूप से पाण्डे परिवार कुमाऊँ का था। शायद यही वजह है कि पाण्डेजी के स्वर में एक पहाड़ी ख़नक सुनाई देती थी।

देवकीनंदन पाण्डेजी अपने स्कूली दिनों में कभी भी मेघावी छात्र नहीं रहे लेकिन वे कभी भी अपनी कक्षा में फेल नहीं हुए। घूमने-फिरने, नाटक करने और खेलकूद में उनकी गहन दिलचस्पी थी। पाठ्य पुस्तके उन्हें कभी भी रास नहीं आईं किंतु नाटक, उपन्यास, कहानियॉं, जीवन चरित्र और इतिहास की पुस्तकें उन्हें हमेशा से आकर्षित करती थीं। उनकी आरंभिक शिक्षा अल्मोड़ा में हुई। अल्मोड़ा यानी हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं के ऊपर बसा नगर । पाण्डेजी के पिता पुस्तकों के अनन्य प्रेमी थे। इस वजह से घर में किताबों का अच्छा ख़ासा संकलन थाजिससे पाण्डेजी को पठन-पाठन में दिलचस्पी होने लगी।


कॉलेज के ज़माने में अंग्रेज़ी अध्यापक विशंभर दत्त भट्ट देवकीनंदन पाण्डे पर अगाध स्नेह रखते थे। उन्होंने पहले-पहल पाण्डेजी की आवाज़ की विशिष्टता को पहचाना और सराहा। उन्होंने अपने इस छात्र को उसकी प्रतिभा का आभास करवाया। भट्टजी पाण्डेजी को रंगमंच के लिये प्रोत्साहित करने लगे। अलमोड़ा में पाण्डेजी ने कई दर्ज़न नाटकों में हिस्सा लिया इससे उनके आत्मविश्वास में मज़बूती आई।

४० के दशक में अल्मोड़ा जैसी छोटी जगह में केवल दो रेडियो थे। एक स्कूल के अध्यापक जोशीजी के घर और दूसरा एक व्यापारी शाहजी के घर। युवा देवकीनंदन पाण्डे को दूसरे महायुद्ध के समाचारों को सुनकर बहुत रोमांच होता। वे प्रतिदिन सारा काम छोड़कर समाचार सुनने जाते। उन दिनों जर्मनी रेडियो के दो प्रसारकों लॉर्ड हो हो और डॉ. फ़ारूक़ी का बड़ा नाम था। दोनों लाजवाब प्रसारणकर्ता थे। उनकी आवाज़ हमेशा पाण्डेजी के दिलो-दिमाग़ में छाई रही। सन् १९४१ में बी.ए. करने के लिए पाण्डेजी इलाहबाद चले आए जहॉं का विश्वविद्यालय पूरे देश में विख्यात था। १९४३ में पाण्डेजी ने लख़नऊ में एक सरकारी नौकरी कर ली और केज्युअल आर्टिस्ट के रूप में एनाउंसर और ड्रामा आर्टिस्ट हेतु उनका चयन रेडियो लखनऊ पर हो गया। इस स्टेशन पर उर्दू प्रसारणकर्ताओं का बोलबाला था। पाण्डेजी हमेशा मानते रहे कि इस विशिष्ट भाषा के अध्ययन और सही उच्चारण की बारीकियों का अभ्यास उन्हें रेडियो लखनऊ से ही मिला।मुझे यह लिखने में कोई झिझक नहीं है कि देवकीनंदन पाण्डे जैसे प्रसारणकर्ताओं की वजह से ही हिंदी को आकाशवाणी जैसे अंग्रेज़ी परिवेश में मान मिलना प्रांरभ हुआ.

देश के आज़ाद होते ही आकाशवाणी पर समाचार बुलेटिनों का सिलसिला प्रारंभ हुआ। दिल्ली स्टेशन पर अच्छी आवाज़ें ढूंढ़ने की पहल हुई। देवकीनंदन पाण्डे ने डिस्क पर अपनी आवाज़ रेकार्ड करके भेजी। फ़रवरी १९४८ में समाचार वाचकों का चयन किया गया। उम्मीदवारों की संख्या थी तीन हज़ार और बिला शक देवकीनंदन पाण्डे का नाम सबसे ऊपर था। आकाशवाणी लखनऊ पर मिले उर्दू के अनुभव ने उन्हें हमेशा स्पष्ट समाचार वाचन में लाभ दिया। पाण्डेजी मानते थे कि निश्चित रूप से देश की भाषा हिन्दी है लेकिन वाचिक परंपरा में उर्दू के शब्दों के परहेज़ नहीं किया जाना चाहिए। हिन्दी-उर्दू की चाशनी सुनने वालों के कान में निश्चित ही रस घोलती है।

१९४८ में आकाशवाणी में हिन्दी समाचार प्रभाग की स्थापना हुई। इसमें आले हसन (जो कालांतर में बीबीसी उर्दू सेवा के विश्व विख्यात प्रसारणकर्ता माने गए) सुरेश अवस्थी, बृजेन्द्र, सईदा बानो और चॉंद कृष्ण कौल। लाज़मी था कि उस समय के समाचार वाचकों को हिन्दी-उर्दू दोनों आना ज़रूरी था। आले हसन का हिन्दी वाचन अद्भुत था। वे बहुत क़ाबिल अनाउंसर और न्यूज़ रीडर थे। शुरू में मूल समाचार अंग्रेज़ी में लिखे जाते थे जिसका अनुवाद वाचक को करना होता था। अशोक वाजपेयी, विनोद कश्यप और रामानुज प्रताप सिंह को भी अनुवाद करने के लिये मजबूर किया गया लेकिन काफ़ी जद्दोजहद के बाद उन्हें इस परेशानी से मुक्ति मिली और हिन्दी समाचार हिन्दी में ही लिखे जाने लगे। यहॉं ये भी उल्लेखनीय है कि मेल्विन डिमेलो और चक्रपाणी जैसे धुरंधर अंग्रेज़ी प्रसारणकर्ताओं से सामने जिन लोगों ने हिन्दी प्रसारण का लोहा मनवाया उसमे ंदेवकीनंदन पाण्डे की भूमिका को बिसराया नहीं जा सकता।

देवकीनंदन पाण्डे समाचार प्रसारण के समय घटनाक्रम से अपने आपको एकाकार कर लेते थे और यही वजह थी उनके पढ़ने का अंदाज़ करोड़ों श्रोताओं के दिल को छू जाता था। उनकी आवाज़ में एक जादुई स्पर्श था। कभी-कभी तो ऐसा लगता था कि पाण्डेजी के स्वर से रेडियो सेट थर्राने लगा है। आज जब टीवी चैनल्स की बाढ़ है और एफ़एम रेडियो स्टेशंस अपने अपने वाचाल प्रसारणों से जीवन को अतिक्रमित कर रहे हैं ऐसे में देवकीनंदन पाण्डे का स्मरण एक रूहानी एहसास से गुज़रना है। तकनीक के अभाव में सिर्फ़ आवाज़ के बूते पर अपने आपको पूरे देश में एक घरेलू नाम बन जाने का करिश्मा पाण्डेजी ने किया। सरदार पटेल, लियाक़त अली ख़ान, मौलाना आज़ाद, गोविन्द वल्लभ पंत, पं. जवाहरलाल नेहरू और जयप्रकाश नारायण के निधन का समाचार पाण्डेजी के स्वर में ही पूरे देश में पहुँचा। संजय गॉंधी के आकस्मिक निधन का समाचार वाचन करने के लिये सेवानिवृत्त हो चुके पाण्डेजी को विशेष रूप से आकाशवाणी के दिल्ली स्टेशन पर आमंत्रित किया गया।


देवकीनंदन पाण्डे को वॉइस ऑफ़ अमेरिका जैसी अंतरराष्ट्रीय प्रसारण संस्था से अपने यहॉं काम करने का ऑफ़र मिला लेकिन देश प्रेम ने उन्हें ऐसा करने से रोका। पाण्डेजी को अपनी शख़्सियत की लोकप्रियता का अंदाज़ उस दिन लगा जब श्रीमती इन्दिरा गॉंधी ने एक बार आकाशवाणी के स्टॉफ़ आर्टिस्टों को उनकी समस्या सुनने के लिये अपने निवास पर आमंत्रित किया। श्रीमती गॉंधी से जब पाण्डेजी का परिचय करवाया गया तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि "अच्छा तो आप हैं हमारे देश की न्यूज़ वॉइस'। पूर्व सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल तो एक बार पाण्डेजी का नाम सुनकर उनसे गले लिपट गए थे।

नए समाचार वाचकों के बारे में पाण्डेजी का कहना था जो कुछ करो श्रद्धा, ईमानदारी और मेहनत से करो। हमेशा चाक-चौबन्द और समसामयिक घटनाक्रम की जानकारी रखो। जितना ़ज़्यादा सुनोगे और पढ़ोगे उतना अच्छा बोल सकोगे। किसी शैली की नकल कभी मत करो। कोई ग़लती बताए तो उसे सर झुकाकर स्वीकार करो और बताने वाले के प्रति अनुगृह का भाव रखो। निर्दोष और सोच समझकर पढ़ने की आदत डालो; आत्मविश्वास आता जाएगा और पहचान बनती जाएगी।

ऊँची क़द काठी के देवकीनंदन पाण्डे आज तो हमारे बीच में नहीं है लेकिन जब भी रेडियो पर समाचार प्रसारणों की बात चलेगी तो उनका नाम इस विधा के शिखर के रूप में जाना जाता रहेगा।

Thursday, 30 June 2016

 



 जगह-जगह देखते चलो।-2
                          सभी का हाल जानते चलो।।

 न कोई कह पाए की दूर हो तुम।-2
                       इसलिए सबको साथ लिए चलो।।
  
 कल देखा है किसने।-2
                          सभी को प्यार करते चलो।।

Thursday, 23 June 2016

Now we live in 21st century here if you have guts then prove it otherwise you will lagging behind.
So you prove it, otherwise start your practice where and how will prove it. Forget your sleeping time and forget whatever you awoke. Remember only one thing  how to prove your self.
Disgusting life, no rules and regulation suffer mantel life. Forget family and personal life but think how to beat exam.






 न जाने कैसी बैचेनी है,
                                 
                                  न सुकूं है न परेशानी है।

बस मिलते नही सुकूं के दो पल,
                                        
                                      बस हम ख़फा तो सब ज़ुदा।


   

Tuesday, 14 June 2016

हमेशा गर्दिशों में रहने के दिन नही होते,
         बुरे दिनों में  मौजों के पल नही होते।

Wednesday, 27 April 2016

कभी-कभी ऐसा वक़्त भी आता है, कभी-कभी ऐसा वक़्त भी आता है,
जब संमय के साथ-साथ, मौका भी धोखा दे जाता हैं।


यूं अश्क बहाने से क्या फायदा,
जब उन को, इनकी किमत का न हो अदाज़ा।


Saturday, 27 June 2015

शाम का मौसम बिंदास है धूमने वाला और मैं घर पर बैठा हुआ हूं, क्या ज़िदगी है साले को सड़ाध मच गई है लाईफ मैं एक कमरे में कैद की तरह बस वहीं रहना न सूरज की रोशनी न बाहर के नज़रे साला कैद है।  बस भगवान से यहीं दुआ है कि जल्दी से यहां से निकाल।
अच्छा धर किसकी ख्वाहिस नही होता मगर मैं तो खुला मैदान चाहता हूं न ही मारबल न ही टाईल्स बस खुला आसमान हो फिर सारी मेरी ख्वाहीशें पूरी हो।
क्योंकि दिल्ली दिल वालों का शहर हो सकता है पर मेरे लिए यहां दिल लगना शायद थोड़ा मंहगा हो जाएगा। इसलिए मैं तो चला अपने गाँव
अलविदा।

काश ये बात सच हो जाती।

Saturday, 20 June 2015

                          परमाणु-रियक्टर का यात्रा  
                 
कहते है वक्त और मौका किसी को बुला कर नही आते, कभी किस्मत से फेसबुक,व्हाटसऐप पर चैटिंग या मोबाइल से वो मौके मिल जाते हैं जो असल ज़िदगी में महज एक सपना होता हैं। बस
एक दिन यहीं बैठकर मैं सोच रहा था कि तभी अपने फोन में फेसबुक खोला उसमें एक दोस्त का मैसेज आया हुआ था कि क्या तुम एक ऐसी जगह चलोगे जो तुमनें उसे फ़िल्म या ख़बरों में देखा या पढ़ा होगा। मन मैं सौचा कि शायद मजाक के मुड़ में है तो मैंने भी कहा कि अभी फ्राईडे दूर है नई फ़िल्म के आने नें दिन हैं तब की तब देखेगें, फिर उसनें मुझसे कहा कि मैंनें तुम्हारा नाम एक जगह चलने को दे दिया बस कल तुम आ जाओ। मैं भी दूसरो दिन उसके पास पहुंच गया। तब वहां पता चला कि हम परमाणु बिजलीधर नरौरा जा रहे हैं रास्ते भर मैं यहीं सोचता रहा कि अब क्या होगा, आगे चलकर फिर मैनें वहां पर जो देखा वो किसी अज़ूबे से कम नही था। शायद ही कभी इतनी सिक्येरिटी कहीं देखी हो, अंदर आने वाले कर्मचारी, वैज्ञानिक सभी सुरक्षा के मानक पूरे होने पर ही अंदर जा सकते थे। अंदर जाने पर हमें कुछ सुरक्षा के नियम और न्यूक्लियर पावर प्लाँट के बारे में बताया गया अचम्भा तो तब हुआ जब उन्होनें ये बताया कि नरौरा देश का पहला न्यूक्लियर पावर प्लाँट भारतीय वैज्ञानिकों का बनाया हुआ हैं फिर उन्होनें अपने संग्रहालय (पूरे रियक्टर के नमूने) को दिखाया जो बस कभी बचपन में 9वीं,10वीं की किताबों में पढ़ा था कैलेन्डरीया (यूरेनियम लगाने की गोल जगह) और पूरी प्रकिया को कुछ सेकेंड में बंद करने कि क्रिया-विधि के बारे में वहां बताया गया।
आगे चलकर वो हमें उस कक्ष में ले गए जहां पूरे रियक्टर की क्रियाविधि पर पैनी नज़र वहां लगे कम्प्यूटर के मांनीटर और लगी लाईटो के माघ्यम से की जा रही थी, वहां कोई भी सकेंत मिलने पर काम करने वाले उसका उतनी ही जल्दी से समाधान निकालते थे। शायद पूरे कक्ष को देखकर यहीं कहा जा सकता था कि कोई एक जगह देश में ऐसी भी है जहां समस्या का समाधान और ख़त्म करने की रफ्तार अन्य जगहों से काफी तेज़ है।
बाद से थोड़ी दूर स्थित रियक्टर की अभिक्रिया में मदद कर रहे जनरेटर बड़ी तेजी से आवाज़ कर अपना काम कर रहे थे चारों तरफ से वो जगह बंद कर दी गई थी, यहां तककि बाहर से आने वाली हवा अदंर और अदंर से आने वाली हवा बाहर न जा सके। अदंर रहने वाले लोगों नें सुरक्षा की दृष्टि से हेलमेट और हेडफोन का इस्तेमाल कर रखा था।
थोड़ी दूर पर वहां एक दरवाज़ा भी लगा हुआ जो उन्हें बाहर के मौसम के बारे में और आपातस्थिति में बाहर जाने का काम करता था।
वहीं से थोड़ी दूर लंबे खम्भे समान चीमनी जैसी आकार की एक सरचंना थी उसमें ऊपर पानी की भाप  और नीचे पानी को झरने की तरह गिराया जा रहा था ताकि रियक्टर में प्रयोग होने हुए पानी को ठंडा और साफ किया जा सके और पानी जहां से लिया गया है, वहां दोबारा साफ पानी डाला जा सके।
उस जगह से आगे हम बस में बैठकर थोड़ा दूर गए, तब मैनें एक इंजीनियर से बात की कि हमें थोड़ी दूरी जाने के लिए बस क्यों मिली है मुस्कुराते हुए उन्होनें कहा कि यहां एयरपोर्ट की तरह नियम है जैसे आप को जहाज से उतरने के बाद पैदल नहीं चलना पड़ता वैसे यहां भी अंदर आपको पैदल नही चलना पड़ता।
बस उतने में ही हम पर्यावरण सर्वेक्षण केन्द्र पहुंच गए, वहां हमने रियक्टर के आस-पास की जगह से लाए सब्जी, पानी, मिटटी के नमूने रखे हुए थे और कुछ की जांच वहां लगी मशीन से हो रही थी इतना ही नही वहां एक मशीन ऐसी भी थी जो वहां काम करने वालो की साल में एक बार जांच करती थी कि कहीं उनमें रेडिएशन का असर तो नही, लेकिन साल भर का डाटा वहां देखने पर अचम्भा इस बात का थी, कि उनको एक भी रेडिएशन प्रभावित कर्मचारी या नमूना नहीं मिला। वैसे अगर गौर करें तो आज दुनिया के कई विकसित देश (कनाडा. अमेरिका, जर्मनी, रुस, जापान) इसका प्रयोग कर अपनी बिजली की कमी को पूरा कर रहे है। भले ही आज हम विश्वस्तर पर फैलाई गई अफवाहों पर ध्यान देकर इसका विरोध करते हों, मगर सच तो ये है कि दुनिया में उर्जा उत्पादन का सबसे सुरक्षित और ज्यादा उर्जा देने का तरीका यहीं है। 60 से 65 साल में 3 या 4 धटनाएं घटी है जिसमें जापान के फुकुशिमा रियक्टर में दुर्धटना के दौरान कोई भी व्यक्ति नही मरा।
सवाल ये उठता है कि जापान जैसा देश जहां आए दिन भूंकप के झटके महसूस किए जाते हैं वो इस काम को छोड़ने को तैयार क्यों नहीं है। तो दूसरी तरफ वर्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन के अनुसार चीन अपने आप को उर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर करने के लिए परमाणु रियक्टर का तेजी के साथ निर्माण कर दुनिया में पहले स्थान पर हैं, जहां कई रियक्टर बनाए जा रहें हैं। लेकिन भारत अब भी बहुत धीमी रफ्तार से इनका निर्माण कर रहा है अगर यहीं हालात रहे तो आने वाले संमय में बिजली की कमी का सामना करना पड़ सकता है। अतः मैं यही कहना चाहूंगा कि
जब देश का करना हो विकास,
तब परमाणु-उर्जा का लो साथ।



Tuesday, 7 April 2015

भगवान भरोसे है सबकुछ

नौकरी ना करी तो का करी। ये शब्द सुन कर बड़ा अजीब लगता है मन ही मन सोच रहे होगें क्या कह रहा है आप भी सुनकर आस- पास देख के हसोगे और कहोगे ये वो पल हैं जब इंन्सान को परखा जाता है इसलिए थोड़ा सब्र रखो और  अपने काम  पर ध्यान दो नौकरी तो आती जाती रहती है। तब ये कहके अपने आप को दिलासा दूंगा सब कुछ भगवान भरोसे। जो हुआ अच्छा हुआ आगे भी अच्छा होगा।
मन में ये भी ख्याल आता है कि अगर भगवान भरोसे सब कुछ छोड़ दिया तो मैं भी कहीं भगवान भरोसे न हो जाऊ और परीक्षा भी देने जाऊ तो भगवान भरोसे, काम करु तो भगवान भरोसे, खाना भी खांऊ भगवान भरोसे, पानी भी पीऊ तोे भगवान भरोसे।
फिर मन में सोचा नौकरी न लगे तो भी भगवान भरोसे। खाना न खांऊ तो भी     भगवान भरोसे, पानी न पीेऊ वो भी भगवान भरोसे हो ही जाना चाहिए। इससे कुछ भी आप समझो भईया, लेकिन अपना हाथ जगन्नाथ होता है।क्योंकि जो मजा अपनी मेहनत और हाथ में है वो कहीं और नही, अब आप बताइये कि आप किस के भरोसे।
          


Monday, 6 April 2015

हेड फोन की मस्ती

हर दिन की तरह आज भी मौसम खुशनुमा था और मैं भी कुछ नया सीखने के मुड से घर से निकला।  रास्ते में कई लोग मिलें वो भी अपने काम से जा रहे थे कुछ तो हेड फोन लगा के अपने में ही मस्त थे शायद कोई रेड एफ्म,कोई रेडियो मिर्च कोई आकाशवाणीं  तो कोई यो यो हनी सिंह  को सुनने में मस्त था, तभी मन में एक  सवाल आया की एक दौर वो था जब एक जगह स्पीकर लगाकर एक गाने को कई बार, तेज आवा़ज़ में खुद के साथ- साथ पास- पड़ोस वाले भी, उस गाने को सुनकर झूमते थे। त्योहारों या किसी कार्यक्रम में तो सभी एक साथ आकर मस्ती करते थे न अब रहे वो कैसेट, न रहे वो लोग शायद यहीं कारण है कि अब वहीं संगीत कितना सीमित हो गया है बस एक ईयरफोन यूज़ करके हमने उसे सीमित कर दिया है। बस मिल जांए फुरसत के कुछ पल, दुनिया के लिए तो आप तनहां हैं मगर अपने लिए खुद किसी राँकस्टार से कम नही समझते ,कभी-कभी तो अंदर का राँकस्टार जाग गया, तो सिंगर के साथ आवाज़ ओवरलैप होने लगती है।
तब जा के समझ आता है कि पहले के गाने पब्लिक प्रोपर्टी हुआ करते थे और अब किसी एक की प्रोपर्टी,
मन किया तो चलाया और सुन के झूम लिया और मन किया तो कर दिया बंद।