Monday, 6 April 2015

हेड फोन की मस्ती

हर दिन की तरह आज भी मौसम खुशनुमा था और मैं भी कुछ नया सीखने के मुड से घर से निकला।  रास्ते में कई लोग मिलें वो भी अपने काम से जा रहे थे कुछ तो हेड फोन लगा के अपने में ही मस्त थे शायद कोई रेड एफ्म,कोई रेडियो मिर्च कोई आकाशवाणीं  तो कोई यो यो हनी सिंह  को सुनने में मस्त था, तभी मन में एक  सवाल आया की एक दौर वो था जब एक जगह स्पीकर लगाकर एक गाने को कई बार, तेज आवा़ज़ में खुद के साथ- साथ पास- पड़ोस वाले भी, उस गाने को सुनकर झूमते थे। त्योहारों या किसी कार्यक्रम में तो सभी एक साथ आकर मस्ती करते थे न अब रहे वो कैसेट, न रहे वो लोग शायद यहीं कारण है कि अब वहीं संगीत कितना सीमित हो गया है बस एक ईयरफोन यूज़ करके हमने उसे सीमित कर दिया है। बस मिल जांए फुरसत के कुछ पल, दुनिया के लिए तो आप तनहां हैं मगर अपने लिए खुद किसी राँकस्टार से कम नही समझते ,कभी-कभी तो अंदर का राँकस्टार जाग गया, तो सिंगर के साथ आवाज़ ओवरलैप होने लगती है।
तब जा के समझ आता है कि पहले के गाने पब्लिक प्रोपर्टी हुआ करते थे और अब किसी एक की प्रोपर्टी,
मन किया तो चलाया और सुन के झूम लिया और मन किया तो कर दिया बंद।

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