शाम का मौसम बिंदास है
धूमने वाला और मैं घर पर बैठा हुआ हूं, क्या ज़िदगी है साले को सड़ाध मच गई है
लाईफ मैं एक कमरे में कैद की तरह बस वहीं रहना न सूरज की रोशनी न बाहर के नज़रे
साला कैद है। बस भगवान से यहीं दुआ है कि
जल्दी से यहां से निकाल।
अच्छा धर किसकी ख्वाहिस नही
होता मगर मैं तो खुला मैदान चाहता हूं न ही मारबल न ही टाईल्स बस खुला आसमान हो
फिर सारी मेरी ख्वाहीशें पूरी हो।
क्योंकि दिल्ली दिल वालों
का शहर हो सकता है पर मेरे लिए यहां दिल लगना शायद थोड़ा मंहगा हो जाएगा। इसलिए
मैं तो चला अपने गाँव
अलविदा।
काश ये बात सच हो जाती।
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