Saturday, 27 June 2015

शाम का मौसम बिंदास है धूमने वाला और मैं घर पर बैठा हुआ हूं, क्या ज़िदगी है साले को सड़ाध मच गई है लाईफ मैं एक कमरे में कैद की तरह बस वहीं रहना न सूरज की रोशनी न बाहर के नज़रे साला कैद है।  बस भगवान से यहीं दुआ है कि जल्दी से यहां से निकाल।
अच्छा धर किसकी ख्वाहिस नही होता मगर मैं तो खुला मैदान चाहता हूं न ही मारबल न ही टाईल्स बस खुला आसमान हो फिर सारी मेरी ख्वाहीशें पूरी हो।
क्योंकि दिल्ली दिल वालों का शहर हो सकता है पर मेरे लिए यहां दिल लगना शायद थोड़ा मंहगा हो जाएगा। इसलिए मैं तो चला अपने गाँव
अलविदा।

काश ये बात सच हो जाती।

Saturday, 20 June 2015

                          परमाणु-रियक्टर का यात्रा  
                 
कहते है वक्त और मौका किसी को बुला कर नही आते, कभी किस्मत से फेसबुक,व्हाटसऐप पर चैटिंग या मोबाइल से वो मौके मिल जाते हैं जो असल ज़िदगी में महज एक सपना होता हैं। बस
एक दिन यहीं बैठकर मैं सोच रहा था कि तभी अपने फोन में फेसबुक खोला उसमें एक दोस्त का मैसेज आया हुआ था कि क्या तुम एक ऐसी जगह चलोगे जो तुमनें उसे फ़िल्म या ख़बरों में देखा या पढ़ा होगा। मन मैं सौचा कि शायद मजाक के मुड़ में है तो मैंने भी कहा कि अभी फ्राईडे दूर है नई फ़िल्म के आने नें दिन हैं तब की तब देखेगें, फिर उसनें मुझसे कहा कि मैंनें तुम्हारा नाम एक जगह चलने को दे दिया बस कल तुम आ जाओ। मैं भी दूसरो दिन उसके पास पहुंच गया। तब वहां पता चला कि हम परमाणु बिजलीधर नरौरा जा रहे हैं रास्ते भर मैं यहीं सोचता रहा कि अब क्या होगा, आगे चलकर फिर मैनें वहां पर जो देखा वो किसी अज़ूबे से कम नही था। शायद ही कभी इतनी सिक्येरिटी कहीं देखी हो, अंदर आने वाले कर्मचारी, वैज्ञानिक सभी सुरक्षा के मानक पूरे होने पर ही अंदर जा सकते थे। अंदर जाने पर हमें कुछ सुरक्षा के नियम और न्यूक्लियर पावर प्लाँट के बारे में बताया गया अचम्भा तो तब हुआ जब उन्होनें ये बताया कि नरौरा देश का पहला न्यूक्लियर पावर प्लाँट भारतीय वैज्ञानिकों का बनाया हुआ हैं फिर उन्होनें अपने संग्रहालय (पूरे रियक्टर के नमूने) को दिखाया जो बस कभी बचपन में 9वीं,10वीं की किताबों में पढ़ा था कैलेन्डरीया (यूरेनियम लगाने की गोल जगह) और पूरी प्रकिया को कुछ सेकेंड में बंद करने कि क्रिया-विधि के बारे में वहां बताया गया।
आगे चलकर वो हमें उस कक्ष में ले गए जहां पूरे रियक्टर की क्रियाविधि पर पैनी नज़र वहां लगे कम्प्यूटर के मांनीटर और लगी लाईटो के माघ्यम से की जा रही थी, वहां कोई भी सकेंत मिलने पर काम करने वाले उसका उतनी ही जल्दी से समाधान निकालते थे। शायद पूरे कक्ष को देखकर यहीं कहा जा सकता था कि कोई एक जगह देश में ऐसी भी है जहां समस्या का समाधान और ख़त्म करने की रफ्तार अन्य जगहों से काफी तेज़ है।
बाद से थोड़ी दूर स्थित रियक्टर की अभिक्रिया में मदद कर रहे जनरेटर बड़ी तेजी से आवाज़ कर अपना काम कर रहे थे चारों तरफ से वो जगह बंद कर दी गई थी, यहां तककि बाहर से आने वाली हवा अदंर और अदंर से आने वाली हवा बाहर न जा सके। अदंर रहने वाले लोगों नें सुरक्षा की दृष्टि से हेलमेट और हेडफोन का इस्तेमाल कर रखा था।
थोड़ी दूर पर वहां एक दरवाज़ा भी लगा हुआ जो उन्हें बाहर के मौसम के बारे में और आपातस्थिति में बाहर जाने का काम करता था।
वहीं से थोड़ी दूर लंबे खम्भे समान चीमनी जैसी आकार की एक सरचंना थी उसमें ऊपर पानी की भाप  और नीचे पानी को झरने की तरह गिराया जा रहा था ताकि रियक्टर में प्रयोग होने हुए पानी को ठंडा और साफ किया जा सके और पानी जहां से लिया गया है, वहां दोबारा साफ पानी डाला जा सके।
उस जगह से आगे हम बस में बैठकर थोड़ा दूर गए, तब मैनें एक इंजीनियर से बात की कि हमें थोड़ी दूरी जाने के लिए बस क्यों मिली है मुस्कुराते हुए उन्होनें कहा कि यहां एयरपोर्ट की तरह नियम है जैसे आप को जहाज से उतरने के बाद पैदल नहीं चलना पड़ता वैसे यहां भी अंदर आपको पैदल नही चलना पड़ता।
बस उतने में ही हम पर्यावरण सर्वेक्षण केन्द्र पहुंच गए, वहां हमने रियक्टर के आस-पास की जगह से लाए सब्जी, पानी, मिटटी के नमूने रखे हुए थे और कुछ की जांच वहां लगी मशीन से हो रही थी इतना ही नही वहां एक मशीन ऐसी भी थी जो वहां काम करने वालो की साल में एक बार जांच करती थी कि कहीं उनमें रेडिएशन का असर तो नही, लेकिन साल भर का डाटा वहां देखने पर अचम्भा इस बात का थी, कि उनको एक भी रेडिएशन प्रभावित कर्मचारी या नमूना नहीं मिला। वैसे अगर गौर करें तो आज दुनिया के कई विकसित देश (कनाडा. अमेरिका, जर्मनी, रुस, जापान) इसका प्रयोग कर अपनी बिजली की कमी को पूरा कर रहे है। भले ही आज हम विश्वस्तर पर फैलाई गई अफवाहों पर ध्यान देकर इसका विरोध करते हों, मगर सच तो ये है कि दुनिया में उर्जा उत्पादन का सबसे सुरक्षित और ज्यादा उर्जा देने का तरीका यहीं है। 60 से 65 साल में 3 या 4 धटनाएं घटी है जिसमें जापान के फुकुशिमा रियक्टर में दुर्धटना के दौरान कोई भी व्यक्ति नही मरा।
सवाल ये उठता है कि जापान जैसा देश जहां आए दिन भूंकप के झटके महसूस किए जाते हैं वो इस काम को छोड़ने को तैयार क्यों नहीं है। तो दूसरी तरफ वर्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन के अनुसार चीन अपने आप को उर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर करने के लिए परमाणु रियक्टर का तेजी के साथ निर्माण कर दुनिया में पहले स्थान पर हैं, जहां कई रियक्टर बनाए जा रहें हैं। लेकिन भारत अब भी बहुत धीमी रफ्तार से इनका निर्माण कर रहा है अगर यहीं हालात रहे तो आने वाले संमय में बिजली की कमी का सामना करना पड़ सकता है। अतः मैं यही कहना चाहूंगा कि
जब देश का करना हो विकास,
तब परमाणु-उर्जा का लो साथ।



Tuesday, 7 April 2015

भगवान भरोसे है सबकुछ

नौकरी ना करी तो का करी। ये शब्द सुन कर बड़ा अजीब लगता है मन ही मन सोच रहे होगें क्या कह रहा है आप भी सुनकर आस- पास देख के हसोगे और कहोगे ये वो पल हैं जब इंन्सान को परखा जाता है इसलिए थोड़ा सब्र रखो और  अपने काम  पर ध्यान दो नौकरी तो आती जाती रहती है। तब ये कहके अपने आप को दिलासा दूंगा सब कुछ भगवान भरोसे। जो हुआ अच्छा हुआ आगे भी अच्छा होगा।
मन में ये भी ख्याल आता है कि अगर भगवान भरोसे सब कुछ छोड़ दिया तो मैं भी कहीं भगवान भरोसे न हो जाऊ और परीक्षा भी देने जाऊ तो भगवान भरोसे, काम करु तो भगवान भरोसे, खाना भी खांऊ भगवान भरोसे, पानी भी पीऊ तोे भगवान भरोसे।
फिर मन में सोचा नौकरी न लगे तो भी भगवान भरोसे। खाना न खांऊ तो भी     भगवान भरोसे, पानी न पीेऊ वो भी भगवान भरोसे हो ही जाना चाहिए। इससे कुछ भी आप समझो भईया, लेकिन अपना हाथ जगन्नाथ होता है।क्योंकि जो मजा अपनी मेहनत और हाथ में है वो कहीं और नही, अब आप बताइये कि आप किस के भरोसे।
          


Monday, 6 April 2015

हेड फोन की मस्ती

हर दिन की तरह आज भी मौसम खुशनुमा था और मैं भी कुछ नया सीखने के मुड से घर से निकला।  रास्ते में कई लोग मिलें वो भी अपने काम से जा रहे थे कुछ तो हेड फोन लगा के अपने में ही मस्त थे शायद कोई रेड एफ्म,कोई रेडियो मिर्च कोई आकाशवाणीं  तो कोई यो यो हनी सिंह  को सुनने में मस्त था, तभी मन में एक  सवाल आया की एक दौर वो था जब एक जगह स्पीकर लगाकर एक गाने को कई बार, तेज आवा़ज़ में खुद के साथ- साथ पास- पड़ोस वाले भी, उस गाने को सुनकर झूमते थे। त्योहारों या किसी कार्यक्रम में तो सभी एक साथ आकर मस्ती करते थे न अब रहे वो कैसेट, न रहे वो लोग शायद यहीं कारण है कि अब वहीं संगीत कितना सीमित हो गया है बस एक ईयरफोन यूज़ करके हमने उसे सीमित कर दिया है। बस मिल जांए फुरसत के कुछ पल, दुनिया के लिए तो आप तनहां हैं मगर अपने लिए खुद किसी राँकस्टार से कम नही समझते ,कभी-कभी तो अंदर का राँकस्टार जाग गया, तो सिंगर के साथ आवाज़ ओवरलैप होने लगती है।
तब जा के समझ आता है कि पहले के गाने पब्लिक प्रोपर्टी हुआ करते थे और अब किसी एक की प्रोपर्टी,
मन किया तो चलाया और सुन के झूम लिया और मन किया तो कर दिया बंद।